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बच्चे को जन्म देने के बाद माँ ज़रूर खाएं ये 7 चीज़ें

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डिलीवरी के बाद नई माओं को स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कब्ज़, कमज़ोरी, शरीर में दर्द आदि ऐसी ही समस्याएं हैं जो महिलाओं को इस वक्त सबसे ज़्यादा परेशान करती हैं। इन सबसे निपटने और सेहत को बेहतर बनाने के लिए आप सदियों से खाई जाने वाली इन चीज़ों को ट्राई कर सकती हैं।

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  • खजूर के लड्डू – खजूर में फाइबर काफी अधिक मात्रा में होता है, जो कब्ज़ को दूर करता है। इसके अलावा, डिलीवरी के बाद एनिमिया से बचने के लिए आयरन की बहुत ज़रूरत होती है, जो खजूर में मौजूद होता है। इसे खाने से थकान और कमज़ोरी भी कम महसूस होती है।
  • सौंफ का पानी – सौंफ पाचन से जुड़ी समस्याओं में काफी प्रभावी होता है। ये समस्या प्रसव के बाद काफी बढ़ जाती है। इसलिए मशहूर शेफ अंजूम आनंद ऐसे वक्त में सौंफ का पानी पीने की सलाह देती हैं।

  • गोंद के लड्डू – खाने वाली गोंद के लड्डू में गोंद के साथ मूंग दाल का आटा, सोयाबीन का आटा और ड्राई फ्रूट्स भी डाला जाता है। ये सभी नई मां के शरीर को प्रोटीन और अन्य पोषक तत्व देते हैं, जिनसे कि वो जल्दी ठीक हो सकती है।
  • मेथी हलवा – मेथी में गलेक्टोगॉग्स (galactogogues) होते हैं जिनसे स्तनपान के लिए दूध को बढ़ावा मिलता है। इस हलवे के लिए भिगाकर रखी मेथी को कुकर में उबालें। फिर एक पैन में डालें। साथ में 1 कप गुड़ और नारियल का दूध मिलाएं। उन्हें भूने। फिर एक कप घी मिलाएं. हलवा तैयार होने पर स्तनपान के लिए तैयार हो रही मां हर रोज़ खाए।
  • अजवायन का पानी या परांठा – गेंहू से बना ये परांठा फाइबर का इच्छा स्रोत होता है। इसमें जब अजवायन मिलाई जाती है तो ये यूट्रस की सफाई करने के साथ-साथ स्तनों में दूध का निर्माण भी बढ़ाता है। साथ ही, इससे पाचन क्रिया ठीक बनी रहती है।
  • पंजीरी – डिलीवरी के बाद महिलाओं को खिलाई जाने वाली चीज़ों में ये सबसे मशहूर है। ये पोषक तत्वों का पावर हाउस भी कह सकते हैं। इसमें आटा, ङी, सौंफ, गोंद, ड्राई फ्रूट्स, गुड़ और कुछ और चीज़ें डाली जाती हैं। ये इस स्थिति में महिलाओं को ऊर्जा देती है।
  • अदरकी-कैंडी – अदरक पाचन क्रिया को बेहतर करता है। ये कैंडी अदरक की जड़, खोया या मिल्क पाऊडर और घी को मिलाकर बनाई जाती है, इससे शरीर का ब्लड सर्कुलेशन भी बढ़ता है जिससे ऐनर्जी महसूस होती है। अदरक की मदद से स्तनपान करने वाले बच्चे का पेट दर्द भी नहीं होता।


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गर्भ में कैसे होता है बच्चे का विकास

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गर्भ में कैसे होता है बच्चे का विकास

गर्भ में शिशु का विकास अपने आप में अनूठी प्रक्रिया हैं। हर माँ बाप को ये उत्सुकता होती हैं के गर्भ में पल रहा शिशु अभी क्या कर रहा हैं, सो रहा हैं, जाग रहा हैं, सुन रहा हैं, अंगूठा चूस रहा हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं गर्भ में शिशु के विकास की पूरी कहानी।

आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि पहले से नौंवे महीने तक शिशु किस तरह अपनी मां के गर्भ में विकास करता है।

पहले से नौवे महीने तक शिशु का विकास।

पहला महीना

1. शिशु एक पानी भरी थैली में होता है।

2. उसकी लंबाई मात्र 0.6 से.मी. होती है।

3. शिशु की लंबाई व वजन में तेजी से बढ़ोतरी होती है।

दूसरा महीना

1. श्रवण और दृष्टि इंद्रिया विकसित होने लगती हैं। पलकें बंद रहती हैं।

2. चेहरे के नैन-नक्श बनने लगते हैं।

3. दिमाग का विकास होने लगता है।

4. नाभिनाल बनती है।

5. हाथ-पैर की उंगलियां व नाखून बनने लगते हैं।

6. अमाशय, यकृत, गुर्दे का विकास होता है।

7. शिशु की लंबाई करीब 3 से.मी. और वजन 1 ग्राम होता है।

8. गर्भाशय पेट में मुलायम गांठ की तरह महसूस होता है।

तीसरा महीना

1. आकार बहुत छोटा होने से शिशु की हलचल महसूस नहीं की जा सकती है।

2. आंखें बन चुकी होती हैं, लेकिन पलकें अभी भी बंद होती हैं।

3. बाजू, हाथ, उंगलियां, पैर, पंजे और पैरों की उंगलियां व नाखून इस महीने में विकसित होते हैं।

4. शिशु के वोकल कॉर्डस बन चुके होते हैं। शिशु सिर ऊपर उठा सकता है।

5. यदि गर्भाशय के अंदर झांका जाए तो बाहरी जननांग बनते हुए दिख सकते हैं।

चौथा महीना

1. शिशु की लंबाई व वजन में तेजी से बढ़ोतरी होती है।

2. बाल आने लगते हैं और सिर पर बाल दिखने लगते हैं।

3.भौहें और पलक के बाल आने लगते हैं।

4.चमड़ी वसायुक्त होने लगती है

पांचवा महीना

1. शिशु कुछ समय गतिशील रहता है तो कुछ समय शांत।

2.एक सफेद चिकना स्त्राव शिशु की त्वचा की एम्नीओटिक पानी से रक्षा करता है।

3. उसकी त्वचा पर झुर्रियां पड़ जाती हैं। त्वचा का रंग लाल होता है।

4. त्वचा ज्यादा वसायुक्त बनती है।

5. इस महीने शिशु की लंबाई करीब 25 से 30 से.मी. और वजन करीब 200 से 450 ग्राम होती है।

छठा महीना

1. त्चचा अभी झुर्री भरी और लाल है।

2. आंखों का विकास पूरा हो जाता है।

3. पलकें खुल सकती हैं। बंद हो सकती हैं।

4. शिशु रो सकता है, लात मार सकता है। उसे हिचकी आ सकती है।

सातवां महीना

1. यदि कोई गर्भवती के पेट पर कान रखे तो शिशु की धड़कन सुनाई दे सकती है।

2. शिशु अंगूठा चूसता है।

3. इस महीने शिशु की लंबाई 32-42 से.मी. होती है। वजन करीब 1100 ग्राम से 1350 ग्राम होता है।

आठवां महीना

1. शिशु की आंखें खुलती हैं।

2. जागने-सोने की खास आदत के साथ शिशु सक्रिय रहता है।

3. इस महीने शिशु का वजन करीब 2000 – 2300 ग्राम है और लंबाई 41-45 से.मी है।

4. इस महीने शिशु की हलचल महसूस होती है।

5. शिशु की लंबाई 18 से.मी. व वजन 100 ग्राम होता है।

नौवां महीना

1. बच्चे की आंखें गहरी कबूतर रंग की होती हैं। जन्म के बाद रंग बदल सकता है।

2. शिशु का सिर नीचे व पैर ऊपर की तरह होते हैं।

3. बच्चा ज्यादा शांत रहता है।

4. इस महीने शिशु की लंबाई 50 से.मी. है और वजन 3200-3400 ग्राम है।


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