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Pregnancy & Parenting

भ्रूण किस प्रकार विकसित होता है

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एक शुक्राणु एक डिंब को निषेचित करता है और लगभग 40 सप्ताह के बाद यह जन्म लेने के लिए तैयार एक पूर्ण विकसित बच्चा बन जाता है। लेकिन इस अवधि के दौरान, वास्तव में गर्भाशय में क्या होता रहता है?

निषेचन

डिंब उत्पन्न करने के समय – पांच दिनों पूर्व और एक दिन बाद तक, यदि आप किसी पुरुष से संभोग करती हैं तो गर्भवती हो सकती हैं। जब पुरुष योनि के अंदर वीर्यपात करते हैं तो शुक्राणु योनि के अंदर तैरते हुए गर्भग्रीवा (सर्विक्स) से होते हुए गर्भाशय के रास्ते, डिंबवाही नलिका तक पहुंचते हैं।

शुक्राणु को यह दूरी तय करने में लगभग 10 घंटे लगते हैं। यदि किसी डिंबवाही नलिका में कोई डिंब इंतज़ार कर रहा है तो यह छोटा सा शुक्राणु उसमें घुसने का प्रयास करता है। यदि किसी डिंब में एक शुक्राणु प्रवेश कर जाता है तो यह निशेचित हो जाता है। उसके बाद निषेचित डिंब, डिंबवाही नलिका से होते हुए गर्भाशय में पहुंच जाता है।

पहला सप्ताह

निषेचित डिंब कोशिका विभाजित होना शुरू हो जाती है- इस अवस्था में इसे युग्मनज (ज़ाइगोट) कहते हैं। कुछ दिनों विभाजन के बाद यह कोशिकाओं की एक गेंद बन जाता है जिसे मोरुला कहते हैं। इसे देख पाने के लिए आप की दृष्टी बहुत ही अच्छी होना चाहिए या सूक्ष्मदर्शी होना चाहिए।oldveda-logo-272

कोशिकाओं की इस गोली के बीच में एक छिद्र बन जाता है जिसमें तरल भरा होता है, इस अवस्था में इसे ब्लास्टोसिस्ट कहते हैं। पहले कुछ देर यह गर्भाषय की दीवारों के चारो ओर तैरती रहती है। इस अवस्था में भी यह आपके मासिक धर्म के साथ गर्भाशय से बाहर निकल सकती है और आपको पता भी नहीं चलेगा कि कुछ हुआ था। लेकिन उसके बाद महत्वपूर्ण क्षण आता हैः यदि गर्भाशय ब्लास्टोसिस्ट को स्वीकार कर लेता है, और यह उसकी परत में घर बना लेता है तो आप गर्भवती हो गई हैं।

इसके बाद भी आपके गर्भधारण के शुरुआती दिनों कई प्रकार की गड़बडि़यां आ सकती हैं। आपको मासिक धर्म कुछ दिन बाद आ सकते हैं, इसके अलावा कुछ नहीं पता चलेगा जब कि वास्तव में आप मां बनने वाली ही थीं। यदि ऐसा आपके गर्भवती होने का पता चलने के बाद होता है तो इसे केवल गर्भस्राव (मिसकैरिज) कह दिया जाता है।

 

दूसरा सप्ताह

अब समुचित गर्भधारण हो चुका है। ब्लास्टोसिस्ट के अंदर विभिन्न कोशिका समूह विकसित होते हैं, जिनसे आगे चलकर बच्चे के विभिन्न अंग बनेंगे। आंतरिक कोशिकाएं विकसित होकर बच्चे के फेफड़े, पेट और आंतें बनती हैं, बीच की सतह मांसपेशियां और हड्डियां बनती हैं और बाहरी सतह नसें एवं त्वचा बनती है।

इस अवस्था में ब्लास्टोसिस्ट का दूसरा नया नाम पड़ता है। अब इसे भ्रूण (एम्ब्रीयो) कहते हैं। दूसरा सप्ताह का अंत आपके मासिक धर्म के लगभग 28 दिनों पर होता है- अर्थात् जब आपका मासिक धर्म आने वाला होता है। और इस अवस्था में आप गर्भवती होना चाहती हैं या नहीं, उसके अुनसार आप परेशान या चिंतित अथवा आशान्वित और रोमांचित होने लगती हैं। क्योंकि आपके मासिक धर्म आने में देरी हो गई है।

आपके मासिक धर्म आने के कुछ दिनों पहले से, गर्भधारण हार्मोन आपकी पेशाब में आने लगते हैं। अतः जैसे ही आपके मासिक धर्म आने में देरी होती है, आप गर्भधारण जांच कर सकती हैं।

 

तीसरा सप्ताह

कोशिकाओं के बंडल में शरीर के विभिन्न अंग विकसित होने के आरंभिक लक्षण नज़र आने लगते हैं- मस्तिष्क (दिमाग) और हृदय (दिल) बड़े होने लगते हैं।

चौथा से आठवां सप्ताह

दिल घड़कने लगता है और बाहें, पैर, आंखें और कान आकार लेने लगते हैं। निप्पल नज़र आने लगते हैं और गुर्दे, पेशाब बनाने लगते हैं। भ्रूण हिलना  शुरू कर देता है। आठवें सप्ताह के अंत तक,  भ्रूण  छोटे से एक अंगूर के दाने के बराबर हो जाता है- लगभग 13 मि.मी का। एक बार फिर इसके नाम बदलने का समय आ जाता हैः भ्रूण को अब गर्भ (फीटस) कहा जाता है।

नवां से बारहवां सप्ताह

भ्रूण अब विकसित होकर मानव आकार ले लेता है। इसकी बाहें और पैर ठीक से बन जाते हैं और यह अपने हाथ की मुट्ठी बांध सकता है। इतना ही नहीं, भ्रूण आवाज भी निकाल सकता है- हालांकि अभी भी यह आपके अंगूठे से बड़ा नहीं होता है।

बारहवें सप्ताह के अंत को पहली तिमाही कहते हैं, गर्भधारण का एक-तिहाई भाग। गर्भस्राव की संभावना पहले बारह सप्ताहों में ही अधिक होती है, इसलिए महिलाएं कभी-कभार इस समय अपने परिचितों को अपने गर्भवती होने के बारे में बताने के लिए थोड़ी प्रतीक्षा करती हैं। कुछ देशों में जहां गर्भपात की अनुमति है, इस समय के बाद गर्भपात नहीं करा सकतीं हैं, अथवा किन्ही खास परिस्थितियों में ही यह हो सकता है।

तेरहवां से उन्नीसवां सप्ताह

भ्रूण चारों ओर हिलना-डुलना शुरू कर देता है और अपने मुख से चूसने जैसी हरकत करने लगता है। 19वें सप्ताह तक भ्रूण सोने-जागने लगता है, और वह सुन सकता है। यह लगभग 12-15 से.मी. लंबा होता है, जो आपकी हथेली के बराबर होता है।

बीसवां से चैबीसवां सप्ताह

आपके अंदर तितलियां उड़ती हैं, या बुलबुले निकलते हैं- अधिकांश महिलाएं अपने अंदर पहली बार भ्रूण की हरकत को कुछ इसी तरह बयान करती हैं। अक्सर ऐसा गर्भधारण की इसी अवधि के आस-पास होता है। हालांकि पहले बच्चे के समय आप 25 सप्ताह तक ऐसा महसूस नहीं भी कर सकती हैं- और दूसरे बच्चे के समय ऐसा 16वें सप्ताह में भी हो सकता है।

चारों ओर तैरने के साथ-साथ अब भ्रूण के भौंहे और पलकें, तथा हाथ एवं पैरों के नाखून निकलने लगते हैं। स्वाद और स्पर्श (छूने की) संवेदना विकसित होती है और आंखें भी ठीक से बन चुकी होती हैं। 24 सप्ताह के बाद जन्मा बच्चा, यदि बहुत अधिक चिकित्सीय देख-भाल की जाए तो जीवित बच सकता है।

पचीसवां से अठाइसवां सप्ताह

दिमाग तेज़ी से विकसित होता है और 28वें सप्ताह तक फेफड़े पूरी तरह विकसित हो जाते हैं, अतः यदि इस समय बच्चा जन्म लेता है तो इसके जीवित बचे रहने की संभावना काफी अधिक होती है। 28वां सप्ताह दूसरी तिमाही, गर्भधारण के बीच के एक-तिहाई भाग का अंत होता है।

 

उनतीसवां से चालीसवां सप्ताह

गर्भधारण के इस अंतिम चरण, तीसरी तिमाही में भ्रूण तेज़ी से बढ़ता है, और गर्भाशयसे बाहर आकर जीवन के लिए तैयार होने के लिए इसका वज़न बढ़ जाता है। यह गर्भाषय के अंदर एम्नीयोटिक तरल में ‘सांस लेने’ लगता है।

अब भ्रूण को गर्भाशय में हिलने-डुलने के लिए अधिक जगह नहीं बचती, लेकिन यह कुछ तगड़े लात मार सकता है और आप इसे बाहर से हिलता हुआ देख सकते हैं। 36वें सप्ताह के लगभग, यदि सब कुछ ठीक रहा हो, तो यह घूमकर अपना सर नीचे की ओर कर लेता है तथा जन्म के लिए तैयार हो जाता है।

 

खुशी का क्षण

अक्सर लोग कहते हैं कि गर्भावस्था नौ महीने की होती है। और अपने पिछले मासिक धर्म की पहली तारीख के आधार पर आपको प्रसव की संभावित तारीख बताई जाती है, कि आपका बच्चा कब पैदा होने वाला है। लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश प्रसव लगभग 37 से 42 सप्ताह में हो जाते हैं। इसलिए इस अवधि के भीतर हुए प्रसव को आप ‘जल्दी’ या ‘देरी से’ हुआ प्रसव नहीं कह सकते हैं।

किसी प्रकार, लगभग 40वें सप्ताह के आस-पास कभी भी वह खुशी वाला क्षण आता है। जाइगोट, मोरुला, ब्लास्टोसिस्ट और एम्ब्रीयो रहने के बाद फीटस का गर्भावस्था का अंतिम नाम परिवर्तन होता हैः अब यह बच्चा कहलाता है। इसके बाद उसका नाम रखना आप पर निर्भर होता है

 


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Diet

मासानुसार गर्भिणी परिचर्या,प्रथम मास से नवम मास तक

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हर मास में गर्भ में शिशु के शरीर की वृधि होती है अत: विकासक्रम के अनुसार हर महीने गर्भिणी को कुछ विशेष आहार लेना चाहए | प्रथम मास में-

प्रथम मास में गो दुग्ध,घी,मक्खन का सेवन करे. मीठी और ठन्डे आहार का सेवन करे. : Sweet, cold and liquid diet, Medicated milk, Madhuyashti, madhuka puspa with butter, honey and sweetened milk

दुसरे मास में – : काकोली ओषधि का गो दूध के साथ सेवन करे

Milk medicated with madhura rasa (sweet taste) drugs, Sweetened milk treated with kakoli

तीसरे मास में – मधु,घी,ढूध का सेवन करे. सस्ती चावल की ढूध के खीर बनाकर सेवन करे साथ ही खिचड़ी का सेवन करे.

Milk with honey and ghrita, Milk with honey and ghrita

 

चतुर्थ मास में : ढूध, मक्खन(25ग्राम) का सेवन करे साथ सस्ठी चावल का ओधन ले.

Milk with butter, Cooked sasti rice with curd, dainty and pleasant food mixed with milk and butter, Milk with one tola (12gm) of butter, Medicated cooked rice

 

पंचम मास में : ढूध घी सस्ठी चावल का पानी ढूध के साथ,ढूध से निकले गए मक्खन का प्रयोग.

Ghrita prepared with butter extracted from milk, Cooked shastika rice with milk, meat of wild animals along with dainty food mixed with milk and ghrita

 

छठा मास में – : मधुर वर्ग की ओषधि और घी ढूध, मीठी दही, गोखरू से सिद्ध घी और यवागू, इस मास में बुद्धि के विकास के लिए बादाम, ब्राह्मी, शंख पुष्पि का सेवन करे

Ghrita prepared from milk medicated with madhura (sweet) drugs, Ghrita or rice gruel medicated with gokshura

सप्तम मास में- : मधुर ओषध के साथ घी ढूध का पवन करे. प्रधक परनी से सिद्ध घी का सेवन, मीठे घी का सेवन करे,

Ghrita medicated with prithakaparnyadi group of drugs.

 

अठमा मास में – ढूध घी का सेवन. अनुवासन, अस्थापन वस्ति का प्रयोग.

Kshira Yawagu mixed with ghrita, Asthapana basti with decoction of badari mixed with bala,atibala satapuspa,patala etc.,honey and ghrita. Asthapan is followed by Anuvasana basti of oil medicated with milk madhura drugs

नवम  मास में – : इन महीने  में चावल को ६ गुना दूध व ६ गुना पानी में पकाकर घी दाल के पाचनशक्ति के अनुसार सुबह-शाम खाये अथवा शाम के भोजन में दूध-दलियें में घी डालकर खाये | शाम का भोजन तरल रूप में लेना जरूरी है |

Anuvasana basti with oil prepared with drugs of Madhura (sweet) group, vaginal tampon of this oil, Unctuous gruels and meat-soup of wild animals up to the period of delivery

 

पंचामृत : ९ महीने नियमित रूप से प्रकृति व पाचनशक्ति के अनुसार पंचामृत ले |
पंचामृत बनाने की विधि : १ चम्मच ताजा दही, ७ चम्मच दूध, २ चम्मच शहद, १ चम्मच घी व १ चम्मच मिश्री को मिला लें | इसमें १ चुटकी केसर भी मिलाना हितावह है |
गुण : यह शारीरिक शक्ति, स्फूर्ति, स्मरणशक्ति व कांति को बढ़ाता है तथा ह्रदय, मस्तिष्क आदि अवयवों को पोषण देता है | यह तीनों दोषों को संतुलित करता है व गर्भिणी अवस्था में होनेवाली उलटी को कम करता है |


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Pregnancy & Parenting

पेरेंट्स जाने-अनजाने में तो नहीं कर रहे बच्चों के साथ ये सारी गलतियां

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लाइफस्टाइल डेस्कः बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए आप उन्हें डांटना तो जानते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बच्चों को अनुशासित रखने की चाहत में आप अक्सर कुछ गलतियां कर बैठते हैं। जानिए, ऐसी ही गलतियों के बारे में। यकीकन ही इन गलतियों को सुधार कर आप और भी अच्छे पेरेंट्स साबित होंगे।
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बच्चों का आत्मविश्वास गिराने के लिए बचपन के किस्से-कहानी न सुनाएं: हर बच्चे में अपनी अलग टेलैंट होता है, जो पक्का ही पड़ोसी या रिश्तेदारों के बच्चों में पाए जाने वाले टेलैंट से बिल्कुल अलग होता है। अपने बच्चे की तुलना, दूसरे बच्चों के साथ करने से आप निश्चित ही उनके आत्मविश्वास को ठेस पहुंचाते हैं। बार-बार बच्चों की तुलना करने पर उन्हें महसूस होने लगता है कि उनमें कोई खास बात है ही नहीं। वे बिल्कुल बेकार हैं। वे खुद को दूसरों से कम आंकने लगते हैं। कई बार अभिभावक बच्चों को अपने बचपन के किस्से-कहानी सुनाते हुए कहते हैं कि कोई सुविधा न होने के बावजूद भी आज वे इस मुकाम पर पहुंचे हैं और एक तुम हो जिसे सभी सुविधाएं मिलने के बावजूद भी कुछ नहीं कर पा रहा है। बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ाएं। उनके आत्मविश्वास को चूर-चूर करने का प्रयास न करें।
हमारा बच्चा हो बेस्ट: नेचर के विपरीत जाने की कोशिश न करें। बच्चे को कम उम्र से अच्छी बातें सिखाना और बताना अच्छा है, लेकिन दबाव डालकर उससे कुछ न करवाएं, उसे सहज तरीके से जीने दें। बच्चों पर दबाव डालने के लिए अक्सर उन्हें घर से बाहर निकलना, दोस्तों से मिलना- जुलना, बाहर बगीचे में खेलने और हर वक्त सिर्फ पढ़ाई करते रहने का दबाव डालते हैं। आपके ऐसे करने से बच्चे का कोई फायदा नहीं हो रहा है। उल्टा अपनी इच्छाओं को पूरा न होते देख, बच्चा अंदर ही अंदर घुटने लगता है। पेरेंट्स के दबाव में पढ़ाई कर लेता है, उसके नंबर भी अच्छे आ जाते हैं, लेकिन जीवनभर उसके दिल में अपने अभिभावकों के खराब छवि बन जाती है। हो सकता है कि बच्चा, भविष्य में बड़ा आदमी बन जाए, लेकिन उसे हमेशा दुख रहेगा कि उसी की अभिभावकों ने उसका बचपन छीन लिया और उसे कुचल कर रख दिया।parenting
मेरा बच्चा सबसे ज्यादा परफेक्ट: दुनिया में कई पेरेंट्स ऐसे भी हैं जो अपने बच्चे को सबसे परफेक्ट समझने लगते हैं। रिश्तेदारों या पड़ोसियों से मिलने पर भी वे अपने बच्चे की तारीफें करने लगते हैं। अगर उनका बच्चा कुछ गलत करता है और दूसरे बच्चे या स्कूल के टीचर इस बारे में शिकायत करते हैं तो आप उनकी शिकायत को भी दरकिनार करके अपने बच्चे को ही सही ठहराते हैं, लेकिन अभिभावक भूल जाते हैं कि उनकी इसी आदत का बच्चे गलत फायदा उठाते हैं। वह गलत काम करने से भी नहीं चूकते, क्योंकि वे जानते हैं कि उनके अभिभावक उनके गलतियों की तरफ कभी ध्यान नहीं देंगे। अपने बच्चे की साइड लेना या उनकी बात सुनना एक हद तक तो सही है, लेकित गलत होने पर भी उनकी तरफदारी करना बिल्कुल गलत है। बच्चे की उसकी गलती का अहसास कराएं और उसे उस गलती के लिए सजा देने से भी चूके नहीं। जब तक बच्चे को पछतावा न हो जाए, तब तक उसे एहसास कराएं।
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जरूरत से ज्यादा कोई काम करना: बच्चे को अच्छी परवरिश देने के लिए हर चीज़ में बैलेंस रखना बहुत जरूरी है। कोई भी काम जरूरत से ज्यादा न करें, जैसे- बच्चे की गलती पर जरूरत से ज्यादा चिल्लाने से बच्चा सहम सकता है। इससे उसकी ग्रोथ पर असर आएगा। वह आपसे बात करने में हिचकिचाने लगेगा। बच्चे की गलती पर उसे समझाएं। उसकी गलती का एहसास कराएं, लेकिन अपने गुस्से पर काबू रखें। ठीक इसी तरह से बच्चे को जरूरत से ज्यादा प्यार देने से भी बच्चा बिगड़ने लगता है। इतना ही नहीं, लेकिन वे अपने पैरों पर खड़े होने में ज्यादा वक्त लेते हैं। उनमें आत्मविश्वास की कमी भी दिखने लगती है।

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गर्भ में कैसे होता है बच्चे का विकास

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गर्भ में कैसे होता है बच्चे का विकास

गर्भ में शिशु का विकास अपने आप में अनूठी प्रक्रिया हैं। हर माँ बाप को ये उत्सुकता होती हैं के गर्भ में पल रहा शिशु अभी क्या कर रहा हैं, सो रहा हैं, जाग रहा हैं, सुन रहा हैं, अंगूठा चूस रहा हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं गर्भ में शिशु के विकास की पूरी कहानी।

आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि पहले से नौंवे महीने तक शिशु किस तरह अपनी मां के गर्भ में विकास करता है।

पहले से नौवे महीने तक शिशु का विकास।

पहला महीना

1. शिशु एक पानी भरी थैली में होता है।

2. उसकी लंबाई मात्र 0.6 से.मी. होती है।

3. शिशु की लंबाई व वजन में तेजी से बढ़ोतरी होती है।

दूसरा महीना

1. श्रवण और दृष्टि इंद्रिया विकसित होने लगती हैं। पलकें बंद रहती हैं।

2. चेहरे के नैन-नक्श बनने लगते हैं।

3. दिमाग का विकास होने लगता है।

4. नाभिनाल बनती है।

5. हाथ-पैर की उंगलियां व नाखून बनने लगते हैं।

6. अमाशय, यकृत, गुर्दे का विकास होता है।

7. शिशु की लंबाई करीब 3 से.मी. और वजन 1 ग्राम होता है।

8. गर्भाशय पेट में मुलायम गांठ की तरह महसूस होता है।

तीसरा महीना

1. आकार बहुत छोटा होने से शिशु की हलचल महसूस नहीं की जा सकती है।

2. आंखें बन चुकी होती हैं, लेकिन पलकें अभी भी बंद होती हैं।

3. बाजू, हाथ, उंगलियां, पैर, पंजे और पैरों की उंगलियां व नाखून इस महीने में विकसित होते हैं।

4. शिशु के वोकल कॉर्डस बन चुके होते हैं। शिशु सिर ऊपर उठा सकता है।

5. यदि गर्भाशय के अंदर झांका जाए तो बाहरी जननांग बनते हुए दिख सकते हैं।

चौथा महीना

1. शिशु की लंबाई व वजन में तेजी से बढ़ोतरी होती है।

2. बाल आने लगते हैं और सिर पर बाल दिखने लगते हैं।

3.भौहें और पलक के बाल आने लगते हैं।

4.चमड़ी वसायुक्त होने लगती है

पांचवा महीना

1. शिशु कुछ समय गतिशील रहता है तो कुछ समय शांत।

2.एक सफेद चिकना स्त्राव शिशु की त्वचा की एम्नीओटिक पानी से रक्षा करता है।

3. उसकी त्वचा पर झुर्रियां पड़ जाती हैं। त्वचा का रंग लाल होता है।

4. त्वचा ज्यादा वसायुक्त बनती है।

5. इस महीने शिशु की लंबाई करीब 25 से 30 से.मी. और वजन करीब 200 से 450 ग्राम होती है।

छठा महीना

1. त्चचा अभी झुर्री भरी और लाल है।

2. आंखों का विकास पूरा हो जाता है।

3. पलकें खुल सकती हैं। बंद हो सकती हैं।

4. शिशु रो सकता है, लात मार सकता है। उसे हिचकी आ सकती है।

सातवां महीना

1. यदि कोई गर्भवती के पेट पर कान रखे तो शिशु की धड़कन सुनाई दे सकती है।

2. शिशु अंगूठा चूसता है।

3. इस महीने शिशु की लंबाई 32-42 से.मी. होती है। वजन करीब 1100 ग्राम से 1350 ग्राम होता है।

आठवां महीना

1. शिशु की आंखें खुलती हैं।

2. जागने-सोने की खास आदत के साथ शिशु सक्रिय रहता है।

3. इस महीने शिशु का वजन करीब 2000 – 2300 ग्राम है और लंबाई 41-45 से.मी है।

4. इस महीने शिशु की हलचल महसूस होती है।

5. शिशु की लंबाई 18 से.मी. व वजन 100 ग्राम होता है।

नौवां महीना

1. बच्चे की आंखें गहरी कबूतर रंग की होती हैं। जन्म के बाद रंग बदल सकता है।

2. शिशु का सिर नीचे व पैर ऊपर की तरह होते हैं।

3. बच्चा ज्यादा शांत रहता है।

4. इस महीने शिशु की लंबाई 50 से.मी. है और वजन 3200-3400 ग्राम है।


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