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Mudra Yoga

सफलता का सूत्र अनुशासन मुद्रा योग

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कहते हैं कि हाथों में व्यक्ति का भविष्य और लेखा-जोखा छिपा है। व्यक्ति अपने हाथ से ही अपनी तकदीर बनाता है और बिगाड़ लेता है। योग में इसीलिए हस्त मुद्राओं का महत्व है। मुद्राओं से जहां शरीर की गति को बदला जा सकता हैं वहीं कर्म और भाग्य को भी बदला जा सकता है। आजमा कर देंखे। यह होम्योपैथी की गोलियों की तरह है।

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जीवन के प्रत्येक्ष क्षेत्र में अनुशासन का महत्व है। अनुशासन से धैर्य और समझदारी का विकास होता है। समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। दूसरी ओर यदि साधना करते समय अगर अनुशासन नहीं हो तो साधना निष्फल हो जाती है। व्यक्ति चाहकर भी जीवन को अनुशासनबद्ध नहीं कर पाता, लेकिन इस मुद्रा को करते रहने से चमत्कारिक रूप से व्यक्ति स्वत: ही अनुशासन में रहने लगता है। सफलता का सूत्र है अनुशासन।

अनुशासन मुद्रा की विधि- बिल्कुल साधारण सी विधि है। अनुशासन मुद्रा को पद्मासन, समपाद या सुखासन में बैठकर अपनी तर्जनी अंगुली को बिल्कुल सीधा कर दें। बाकी बची हुई तीनों अंगुलियों को अंगूठे के साथ मिला लें। इस मुद्रा को अनुशासन मुद्रा कहते हैं।

समय- प्रारंभ में इस मुद्रा को प्रतिदिन 5 से 8 मिनट करें। फिर 1 महीने तक इसके अभ्यास का 1-1 मिनट बढ़ाते जाएं।

परिणाम और लाभ- इस मुद्रा को करने से व्यक्ति अनुशासन में रहना सिख जाता है। अनुशासन मुद्रा को करने से नेतृत्व करने की शक्ति बढ़ती है। इससे कार्य क्षमता का विकास होता है तथा व्यक्ति में नेतृत्व की शक्ति जाग्रत होने लगती है। अनुशासन मुद्रा सफलता का सूत्र है।

ये मुद्रा एक्यूप्रेशर चिकित्सकों अनुसार रीढ़ की हड्डी पर असर करती है और व्यक्ति अपने आप में नई जवानी को महसूस करता है।

सावधानी- किसी की तरफ अंगुली उठाकर बात ना करें, इससे अनुशासन भंग होता है। अनुशासन मुद्रा को एक बार में ज्यादा लंबे समय तक न करें। अंगुली को जबरदस्ती ताने नहीं।


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Mudra Yoga

खेचरी मुद्रा से मिलती है समाधि और सिद्धि

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मनुष्य की जीभ (जिह्वा) दो तरह की होती हैं- लंबी और छोटी। लंबी जीभ को सर्पजिह्वा कहते हैं। कुछ लोगों की जीभ लंबी होने से वे उसे आसानी से नासिकाग्र पर लगा सकते हैं और खेचरी-मुद्रा कर सकते हैं। मगर जिसकी जीभ छोटी होती है उसे तकलीफों का सामना करना पड़ता है। सबसे पहले उन्हें अपनी जीभ लंबी करनी पड़ती है और उसके लिए घर्षण व दोहन का सहारा लेना पड़ता है। जीभ नीचे की ओर से जिस नाड़ी से जुड़ी होती है उसे काटना पड़ता है।

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खेचरी मुद्रा को सिद्ध करने एवं अमृत के स्राव हेतु आवश्यक उद्दीपन में कुछ वर्ष भी लग सकते हें। यह व्यक्ति की योग्यता पर भी निर्भर करता है। योग में कुछ मुद्राएं ऐसी हैं जिन्हें सिर्फ योगी ही करते हैं। सामान्यजनों को इन्हें नहीं करना चाहिए। खेचरी मुद्रा साधकों के लिए मानी गई है।

विधि : इसके लिए जीभ और तालु को जोड़ने वाले मांस-तंतु को धीरे-धीरे काटा जाता है अर्थात एक दिन जौ भर काटकर छोड़ दिया जाता है। फिर तीन-चार दिन बाद थोड़ा-सा और काट दिया जाता है।

इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा काटने से उस स्थान की रक्त शिराएं अपना स्थान भीतर की तरफ बनाती जाती हैं। जीभ को काटने के साथ ही प्रतिदिन धीरे-धीरे बाहर की तरफ खींचने का अभ्यास किया जाता है।

इसका अभ्यास करने से कुछ महीनों में जीभ इतनी लंबी हो जाती है कि यदि उसे ऊपर की तरफ लौटा (उल्टा करने) दिया जाए तो वह श्वास जाने वाले छेदों को भीतर से बंद कर देती है। इससे समाधि के समय श्वास का आना-जाना पूर्णतः रोक दिया जाता है।

लाभ : इस मुद्रा से प्राणायाम को सिद्ध करने और सामधि लगाने में विशेष सहायता मिलती है। साधनारत साधुओं के लिए यह मुद्रा बहुत ही लाभदायी मानी जाती है।

विशेषता : निरंतर अभ्यास करते रहने से जिब जब लंबी हो जाती है, तब उसे नासिका रन्ध्रों में प्रवेश कराया जा सकता है। इस प्रकार ध्यान लगाने से कपाल मार्ग एवं बिंदु विसर्ग से संबंधित कुछ ग्रंथियों में उद्दीपन होता है। जिसके परिणामस्वरूप अमृत का स्राव आरंभ होता है। उसी अमृत का स्राव होते वक्त एक विशेष प्रकार का आध्यात्मिक अनुभव होता है। इस अनुभव से सिद्धि और समाधि में तेजी से प्रगति होती है।

चेतावनी : यह आलेख सिर्फ जानकारी हेतु है। कोई भी व्यक्ति इसे पढ़कर करने का प्रयास न करे, क्योंकि यह सिर्फ साधकों के लिए है आम लोगों के लिए नहीं।


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Hair Care

गंजेपन का इलाज माण्डुकी मुद्रा

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यदि आपके बाल झड़ रहे हैं या सफेद हो रहे हैं तो यह मुद्रा आपके लिए है। गंजेपन से निजात पाने के लिए योग शास्त्र में माण्डु की मुद्रा को सबसे श्रेष्ठ उपाय बताया गया है। इसका लगातार अभ्यास करने से बाल स्वस्थ और मजबूत बन जाते हैं।

माण्डुकी मुद्रा बनाने की विधि :सबसे पहले मुंह को बंद कर दें। फिर जीभ को पूरे तालू के ऊपर दाएं-बाएं और ऊपर-नीचे घुमाएं। इससे जीभ में लार उत्पन्न होगी। इसी को सुधा या अमृत कहते हैं। तालू से टपकती हुई लार बूंदों का जीभ से पान करें। इस क्रिया को ही माण्डुकी मुद्रा कहते हैं।

इसका लाभ- इसको करने से झुर्रियां पड़ना और बालों का सफेद होना रुक जाता है तथा नव यौवन की प्राप्ति होती है। इससे त्वचा चमकदार बनती है तथा इसके नियमित अभ्यास से वात-पित्त एवं कफ की समस्या दूर हो जाती है।


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Mudra Yoga

योनि मुद्रा योग का चमत्कार

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योनि मुद्रा योग। हस्त मुद्राएं कई प्रकार की होती है और उन सबके अलग अलग स्वास्थ्‍य लाभ हैं। यौगिक दृष्टि योग मुद्राओं में योनि मुद्रा को भी खास महत्व मिला हुआ है। हालांकि तंत्रशास्त्र में इसका अलग महत्व है लेकिन यहां यह मुद्रा प्राणवायु के लिए उत्तम मानी गई है। यह बड़ी चमत्कारी मुद्रा है|

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विशेष : इस योनि हस्त मुद्रा योग (yoni mudra yoga) के निरंतर अभ्यास के साथ मूलबंध क्रिया भी की जाती है। योनि मुद्रा को तीन तरह से किया जाता है। ध्यान के लिए अलग, सामान्य मुद्रा अलग लेकिन यहां प्रस्तुत है कठिनाई से बनने वाली मुद्रा का विवरण।

योनि मुद्रा विधि : पहले किसी भी सुखासन की स्थिति में बैठ जाएं। फिर दोनों हाथों की अंगुलियों का उपयोग करते हुए सबसे पहले दोनों कनिष्ठा अंगुलियों को आपस में मिलाएं और दोनों अंगूठे के प्रथम पोर को कनिष्ठा के अंतिम पोर से स्पर्श करें।

फिर कनिष्ठा अंगुलियों के नीचे दोनों मध्यमा अंगुलियों को रखते हुए उनके प्रथम पोर को आपस में मिलाएं। मध्यमा अंगुलियों के नीचे अनामिका अंगुलियों को एक-दूसरे के विपरीत रखें और उनके दोनों नाखुनों को तर्जनी अंगुली के प्रथम पोर से दबाएं।

इसका आध्यात्मिक लाभ : योनि मुद्रा बनाकर और पूर्व मूलबंध की स्थिति में सम्यक् भाव से स्थित होकर प्राण-अपान को मिलाने की प्रबल भावना के साथ मूलाधार स्थान पर यौगिक संयम करने से कई प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं|

भौतिक लाभ : अंगूठा शरीर के भीतर की अग्नि को कंट्रोल करता है। तर्जनी अंगुली से वायु तत्व कंट्रोल में होता है। मध्‍यमा और अनामिका शरीर के पृथ्वी तत्व को कंट्रोल करती है। कनिष्ठा अंगुली से जल तत्व कंट्रोल में रहता है।

इसके निरंतर अभ्यास से जहां सभी तत्वों को लाभ मिलता है वहीं इससे इंद्रियों पर नियंत्रण रखने की शक्ति बढ़ती है।

इससे मन को एकाग्र करने की योग्यता का विकास भी होता है। यह शरीर की नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर सकारात्मक का विकास करती है। इससे हाथों की मांसपेशियों पर अच्छा खासा दबाव बनता है जिसके कारण मस्तिष्क, हृदय और फेंफड़े स्वस्थ बनते हैं।


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